लखनऊ, उत्तर प्रदेश | 05 फरवरी 2026
सुबह के चार बजे हैं। उत्तर भारत की सर्द हवा अब भी तीखी है। एक किशोर साइकिल पर अख़बारों का गठ्ठर बाँधे कच्ची सड़क पर निकल पड़ता है। कुछ घंटों में उसे स्कूल पहुँचना है, लेकिन उससे पहले गांव-गांव अख़बार बाँटना ज़रूरी है। यह दृश्य उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले में असामान्य नहीं है। असामान्य है तो बस यह कि यही किशोर—अमन कुमार—आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर युवाओं की आवाज़ के रूप में पहचाना जाता है।
ग्रामीण भारत में बचपन अक्सर उम्र से पहले जिम्मेदारियों से टकराता है। यह कहानी उसी टकराव की है—और उस सवाल की भी कि अगर सही समय पर भरोसा, सूचना और अवसर मिल जाएँ, तो क्या नतीजा बदल सकता है।
बाल श्रम: जिसे आँकड़ों में गिना जाता है, नाम से कम ही कहा जाता है
अमन जब कक्षा 8 में थे, तब उनका दिन दो हिस्सों में बंटा था—सुबह अख़बार बाँटना, फिर स्कूल। कई बार रास्ते में ही कपड़े बदलकर कक्षा में पहुँचना पड़ता था। कुछ समय बाद गांव की एक ट्यूबलाइट फैक्ट्री में काम शुरू हुआ—सुबह 8 बजे से रात 9 बजे तक। बीच में एक घंटे का विराम। थकान इतनी कि खाने से ज़्यादा कीमती नींद लगती थी।
यह बाल श्रम था—वह सच, जिसे ग्रामीण भारत में अक्सर “मदद करना” या “मजबूरी” कहकर सामान्य बना दिया जाता है। सरकारी आंकड़े इस समस्या को दर्ज करते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। स्कूल और काम के बीच झूलता बचपन—न पूरी तरह छात्र, न पूरी तरह मज़दूर।
अमन के लिए यह सिर्फ़ आर्थिक दबाव नहीं था, बल्कि पहचान का संकट भी था। वह खुद को पूछते हैं—क्या यह जीवन का स्थायी सच है?
वह ‘तेज़ रास्ता’ जिसकी चर्चा खुले में नहीं होती
ग्रामीण इलाकों में गरीबी के साथ एक और अनकहा सच चलता है—जल्दी बाहर निकलने की बेचैनी। कुछ रास्ते “तेज़” कहे जाते हैं। वे रास्ते जिनमें मेहनत कम और पैसा जल्दी मिलता है। इस पर खुलकर बात कम होती है, लेकिन युवा इसे देखते-समझते हैं।
अमन बताते हैं कि किशोरावस्था में उनके सामने भी विकल्प थे। एक तरफ़ लंबी मेहनत, दूसरी तरफ़ गलत संगत का आकर्षण। उन्होंने दूसरा नहीं चुना। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि हर कोई ऐसा नहीं कर पाता। यही वह बिंदु है, जहां कई युवा अपराध की तरफ़ फिसल जाते हैं—और बाद में समाज उन्हें दोषी ठहराता है, यह पूछे बिना कि उन्हें वहां तक पहुंचाने वाली परिस्थितियां क्या थीं।
सूचना का अभाव: सबसे बड़ी असमानता
अमन के जीवन की दिशा तब बदलनी शुरू हुई जब उन्होंने एक साधारण-सा सवाल पूछा—अगर अवसर हैं, तो गांवों तक पहुँच क्यों नहीं रहे?
अख़बार बेचते हुए उन्होंने अख़बार पढ़ने की आदत बनाई। वहीं उन्हें पता चला कि सरकार युवाओं के लिए छात्रवृत्तियाँ, इंटर्नशिप, कौशल कार्यक्रम और स्वयंसेवी योजनाएँ चला रही है। लेकिन उनके आसपास के युवाओं को इसकी जानकारी नहीं थी। योग्यता थी, पर सूचना का अभाव था।
इसी कमी को पाटने के लिए उन्होंने अपने दोस्तों के साथ एक व्हाट्सएप समूह बनाया। कोई अभियान नहीं, कोई फंडिंग नहीं—सिर्फ़ जानकारी साझा करना। असर धीरे-धीरे दिखा। कुछ युवाओं ने आवेदन किया, कुछ को अवसर मिले।
यह प्रयोग आगे चलकर Contest 360 नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म में बदला—एक ऐसी वेबसाइट, जहाँ एक क्लिक पर शिक्षा और करियर से जुड़ी जानकारियाँ मिलती हैं। आज इस प्लेटफॉर्म को 84 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। यह संख्या बताती है कि समस्या मांग की नहीं, पहुंच की थी।
प्रशासन से टकराव नहीं, तालमेल
वर्ष 2022 में कांवड़ यात्रा के दौरान अमन ने अख़बारों में संभावित अव्यवस्थाओं के बारे में पढ़ा। श्रद्धालुओं की संख्या, स्वास्थ्य जोखिम और सूचना की कमी—ये सब चिंता के विषय थे। अमन ने इसे सिर्फ़ समस्या की तरह नहीं देखा, बल्कि समाधान की तरह सोचा।
उन्होंने माय भारत के माध्यम से जिला प्रशासन के सामने एक तकनीकी प्रस्ताव रखा। यह वह क्षण था, जब जमीनी अनुभव और प्रशासनिक विश्वास मिले। बागपत प्रशासन ने प्रस्ताव को गंभीरता से लिया और कांवड़ यात्रा ऐप विकसित किया गया, जिससे मार्ग, चिकित्सा सहायता, शिविर, आपात संपर्क और प्रशासनिक सूचनाएँ एक मंच पर उपलब्ध हो सकीं।
इसके बाद स्वीप बागपत ऐप के ज़रिये मतदान जागरूकता, सूचना सेतु के माध्यम से योजनाओं और अधिकारियों तक डिजिटल पहुंच, और ग्राम पंचायत फैजपुर निनाना की वेबसाइट—ये पहलें दिखाती हैं कि स्थानीय युवाओं को भागीदार बनाकर प्रशासन कैसे प्रभावी हो सकता है।
डिजिटल इंडिया और गांव की हकीकत
डिजिटल इंडिया की चर्चा अक्सर स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट कनेक्शन तक सिमट जाती है। लेकिन गांवों में चुनौती इससे आगे की है—डिजिटल साक्षरता, भरोसा और उपयोगिता। अमन की पहलें इसी खाई को पाटने की कोशिश करती हैं।
उनका तर्क सरल है—अगर जानकारी सरल भाषा में, भरोसेमंद स्रोत से और स्थानीय संदर्भ में दी जाए, तो गांव का युवा भी डिजिटल व्यवस्था को अपनाता है। यही कारण है कि उनके प्लेटफॉर्म और ऐप्स का उपयोग व्यवहार में बदला।
पहचान का संकट और प्रतिनिधित्व
ग्रामीण युवाओं के सामने एक और अदृश्य चुनौती होती है—कमतर समझे जाने की मानसिकता। राष्ट्रीय मंचों पर अक्सर शहरी पृष्ठभूमि हावी रहती है। अमन की यात्रा इस धारणा को चुनौती देती है।
वे UNICEF India के नेशनल यूथ एंबेसडर बने, UNESCO की ग्लोबल यूथ कम्युनिटी से जुड़े और फिनलैंड स्थित HundrED संस्थान में ग्लोबल एडवाइजर बने। UNFCCC के YOUNGO नेटवर्क, Climate Cardinals और Global Youth Biodiversity Network से जुड़ाव ने उन्हें वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाया।
78वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत सरकार के विशेष युवा अतिथि के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया। यह प्रतीकात्मक था—एक गांव से निकला युवा, राष्ट्रीय समारोह में।
पुरस्कार और उसके मायने
जनवरी 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार ने अमन को स्वामी विवेकानंद राज्य युवा पुरस्कार से सम्मानित किया—बागपत के इतिहास में पहली बार। दिसंबर 2025 में उन्हें देश का I-Volunteer Youth Champion Award मिला—पूरे भारत में एकमात्र।
ये पुरस्कार व्यक्तिगत उपलब्धि से आगे जाते हैं। वे यह संकेत देते हैं कि नीति-निर्माण में युवाओं को केवल लाभार्थी नहीं, भागीदार माना जा सकता है।
आज और आगे
वर्तमान में अमन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से समाज कार्य की पढ़ाई कर रहे हैं और बागपत में जिला प्रशासन के साथ स्वैच्छिक योगदान दे रहे हैं। विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2026 में उन्हें टीम यूपी का नेतृत्व सौंपा गया—जहाँ प्रधानमंत्री ने युवाओं से संवाद किया।
लेकिन अमन की कहानी का महत्व पुरस्कारों या पदों में नहीं है। इसका महत्व उन सवालों में है, जो यह कहानी छोड़ जाती है—
- अगर सही समय पर भरोसा मिले, तो कितने बच्चे फैक्ट्री से स्कूल लौट सकते हैं?
- अगर सूचना सुलभ हो, तो कितने युवा अपराध की ओर जाने से रुक सकते हैं?
- और अगर प्रशासन स्थानीय आवाज़ों को सुने, तो कितनी नीतियाँ ज़्यादा असरदार हो सकती हैं?








