उत्तर प्रदेश के युवा इतिहास में त्याग और सामाजिक जिम्मेदारी का एक ऐसा अनोखा मामला सामने आया है, जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के नीति-निर्धारकों का ध्यान खींच लिया है। सूबे का सर्वोच्च ‘स्वामी विवेकानंद राज्य युवा पुरस्कार’ जीतने वाले बागपत के युवा आइकॉन अमन कुमार ने परंपरा से परे जाकर एक बड़ा फैसला लिया है। आमतौर पर लोग ऐसे बड़े सम्मानों को अपने घरों की बैठकों में सजाकर रखते हैं, लेकिन अमन ने इसे आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा के लिए समाज को सौंपने का निर्णय लिया है।
अमन कुमार ने बागपत की जिलाधिकारी अस्मिता लाल के समक्ष एक विशेष प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। इसमें उन्होंने अनुरोध किया है कि पुरस्कार के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दी गई स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा को जिले के किसी प्रमुख सार्वजनिक स्थान पर स्थापित किया जाए। चूंकि यह बागपत के इतिहास का पहला राज्य युवा पुरस्कार है, इसलिए अमन का मानना है कि यह केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे जिले की युवा शक्ति के संघर्ष, सपनों और संभावनाओं का साझा प्रतीक है। उनका कहना है कि यदि कोई भी ग्रामीण युवा इस प्रतिमा को देखकर विपरीत परिस्थितियों से लड़कर आगे बढ़ने का हौसला जुटा पाता है, तो यही इस सम्मान की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।
साइकिल पर अखबार बेचने से शुरू हुआ सफर
बागपत के ट्यौढ़ी गांव के रहने वाले अमन कुमार की कहानी ग्रामीण परिवेश की जमीनी हकीकत को बयां करती है। बचपन में गंभीर आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने गांव-गांव जाकर साइकिल से अखबार बेचने का काम किया। परिवार की मदद के लिए शुरू हुआ यह संघर्ष ही उनके जीवन का सबसे बड़ा शिक्षक बन गया। अखबार पढ़ते-पढ़ते अमन को सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्तियों और युवा कार्यक्रमों की जानकारी होने लगी। उन्हें समझ आया कि गांवों में टैलेंट की कमी नहीं है, बल्कि सही जानकारी न होना ही सबसे बड़ी बाधा है। बस, यहीं से उन्होंने ठान लिया कि वह हर युवा तक अवसरों की जानकारी पहुंचाएंगे।
‘माय भारत’ ने तराशी नेतृत्व क्षमता
अमन की इस यात्रा को नया आयाम तब मिला जब वह केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय की इकाई ‘माय भारत’ (MY Bharat) से जुड़े। यह मंच किस तरह जमीनी स्तर पर युवाओं की ताकत बदल रहा है, अमन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग’ में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों की टीम का ग्रुप कैप्टन के रूप में नेतृत्व किया। राष्ट्रीय युवा दिवस पर मुख्यमंत्री ने उन्हें इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजा था।
अमन बताते हैं कि पुरस्कार मिलने के बाद ‘माय भारत’ के डिप्टी डायरेक्टर अरुण तिवारी ने उनसे एक बात कही थी, जिसने उनकी सोच बदल दी। उन्होंने कहा था— “किसी भी सम्मान की असली सफलता यह है कि उससे कितने नए विवेकानंद तैयार होते हैं।”
कैलाश सत्यार्थी की राह पर बढ़े कदम
इस विचार को अमली जामा पहनाकर समाज को समर्पित करने की प्रेरणा अमन को ‘सत्यार्थी समर स्कूल’ के दौरान नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी से मिलकर मिली। अमन ने जाना कि कैलाश सत्यार्थी ने अपना नोबेल पदक राष्ट्र को समर्पित कर दिया था, जो आज राष्ट्रपति भवन में सुरक्षित है और लाखों लोगों को प्रेरित करता है। इसके अलावा, केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया द्वारा ‘माय भारत’ के गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड को देश के युवाओं का साझा पुरस्कार बताने से अमन का यह संकल्प और मजबूत हो गया।
अमन की यह पहल केवल प्रतीकात्मक नहीं है। वे पिछले डेढ़ साल से पुरस्कार में मिली संपूर्ण प्रोत्साहन राशि का उपयोग युवाओं के वैचारिक विकास पर कर रहे हैं। वे अब तक हजारों युवाओं को स्वामी विवेकानंद के विचारों से जुड़ी पुस्तकें और प्रेरक साहित्य मुफ्त बांट चुके हैं।
देशभर के लिए नजीर बनेगी यह सोच
सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों का कहना है कि उत्तर प्रदेश के युवा इतिहास में अपने व्यक्तिगत सम्मान को इस तरह लोक-कल्याण के लिए समर्पित करने का यह पहला और दुर्लभ उदाहरण है। तकनीक और सोशल मीडिया के माध्यम से देश के लाखों युवाओं को छात्रवृत्ति, इंटर्नशिप और करियर के अवसरों से जोड़ने वाले अमन कुमार आज स्वयं एक मिसाल बन चुके हैं। अमन के शब्दों में— “अवसर और सम्मान तभी सबसे मूल्यवान होते हैं, जब वे दूसरों के काम आएं।” कभी दूसरों के घरों में अखबार के जरिए देश-दुनिया की खबरें पहुंचाने वाला यह युवा, आज अपनी इसी अभिनव सोच के कारण स्वयं पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन चुका है।


