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विशेष लेख: समाज के अदृश्य गड्ढों में खोती एक पीढ़ी

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Baghpat

  • किस्मत, बिगड़ैल, नालायक और मजबूरी जैसे शब्द अक्सर उन सामाजिक कारणों को छिपा देते हैं, जिनकी वजह से लाखों युवा चुपचाप पीछे छूट जाते हैं। सवाल यह नहीं कि कौन गिरा, सवाल यह है कि समाज ने वह गड्ढा अब तक भरा क्यों नहीं।

सड़क पर बने गड्ढे की एक अच्छी बात होती है। वह दिखाई देता है। इसलिए जब कोई उसमें गिरता है, तो लोग दौड़कर पहुंच जाते हैं। कोई उसे उठाता है, कोई अस्पताल ले जाता है, कोई किसी को दोष देता है। कुछ दिन बाद वह गड्ढा भर भी दिया जाता है, क्योंकि वह सबकी नजर में होता है। लेकिन समाज के गड्ढे दिखाई नहीं देते। यहां उन्हें गड्ढा नहीं कहा जाता। उन्हें किस्मत, मजबूरी, उम्र का असर, बुरा संग, नालायक, कमजोर, नशेड़ी या अपराधी कह दिया जाता है। इन्हीं शब्दों के पीछे हमारे बच्चे और युवा छिप जाते हैं। जब कोई गलत बात रोज़ दिखाई देने लगे, तो वह गलत नहीं लगती, सामान्य लगने लगती है।

गांव की सुबह बहुत जल्दी होती है। कोई लड़का शहर जाने वाली बस पकड़ने निकलता है। कोई महीनों से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है। कोई नौकरी की तलाश में हर रोज़ लौट आता है। कोई पहले की तरह दोस्तों के बीच नहीं बैठता। कोई दिनभर मोबाइल में डूबा रहता है। गांव इन चेहरों को रोज़ देखता है, लेकिन उनके भीतर बन रहे अदृश्य गड्ढों को नहीं देखता। कहा जाता है कि युवा बिगड़ रहे हैं। लेकिन कोई युवा अचानक नहीं बिगड़ता। वह पहले निराश होता है। फिर चुप हो जाता है। फिर लोगों से दूर होने लगता है। फिर मदद मांगना छोड़ देता है। समाज को उसकी आख़िरी हालत दिखाई देती है, उसके टूटने की शुरुआत नहीं।

कहा जाता है कि नशा बढ़ रहा है। लेकिन नशा अक्सर पहली समस्या नहीं होता। उससे पहले बेरोजगारी होती है, दिशा का अभाव होता है, बार-बार मिली असफलताएं होती हैं, तुलना होती है, अपमान होता है और वह लंबी चुप्पी होती है जिसमें एक युवा धीरे-धीरे यह मान लेता है कि उसके लिए अब कोई रास्ता नहीं बचा। जिस दिन वह नशे में दिखाई देता है, उस दिन उसकी नहीं, समाज की कई साल पुरानी हार दिखाई देती है।

कहा जाता है कि अपराध बढ़ रहे हैं। लेकिन हर अपराधी से पहले एक अनसुना बच्चा होता है। वह पहले स्कूल से दूर होता है, फिर अच्छे साथियों से, फिर उम्मीद से और आखिर में कानून तक पहुंच जाता है। अदालत उसे सजा दे देती है, लेकिन उस समाज से कोई जवाब नहीं मांगता जिसने उसे गिरते हुए देखा और चुप्पी साध ली। विद्यार्थियों में मानसिक तनाव की चर्चा बढ़ रही है। लेकिन मानसिक तनाव परीक्षा वाले दिन पैदा नहीं होता। वह तब बढ़ता है, जब बच्चे की हर दिन किसी और से तुलना होती है। जब उससे पूछा जाता है कि कितने अंक आए, लेकिन यह नहीं पूछा जाता कि वह कैसा है। जिस बच्चे की चुप्पी किसी ने नहीं सुनी, उसकी खबर एक दिन सब पढ़ते हैं।

कहा जाता है कि गांव के युवा आगे नहीं बढ़ते। लेकिन जिस गांव में अवसरों की जानकारी समय पर नहीं पहुंचती, जहां मार्गदर्शन सुविधा नहीं बल्कि संयोग हो, वहां प्रतिभा की कमी नहीं होती। वहां रास्ते की कमी होती है। बेरोजगारी केवल नौकरी का संकट नहीं, बल्कि जानकारी, कौशल और अवसरों तक असमान पहुंच का भी संकट है। हम परिणामों पर बहस करते हैं, कारणों पर नहीं। हमें नशा दिखाई देता है, निराशा नहीं। हमें अपराध दिखाई देता है, उपेक्षा नहीं। हमें बेरोजगारी दिखाई देती है, अवसरों तक असमान पहुंच नहीं। हमें असफलता दिखाई देती है, टूटा हुआ आत्मविश्वास नहीं। हम आख़िरी घटना देखते हैं, पहली नहीं।

सरकार योजनाएं बनाती है। स्कूल नाम लिखते हैं। कॉलेज प्रवेश देते हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं अभियान चलाती हैं। परिवार चिंता करता है। समाज भी चिंता करता है। फिर भी हर साल लाखों युवा पीछे छूट जाते हैं। सवाल योजनाओं की संख्या का नहीं है। सवाल यह है कि सबसे पीछे खड़ा युवा आखिर किसकी जिम्मेदारी है। परिवार कुछ देखता है। स्कूल कुछ देखता है। दोस्त कुछ देखते हैं। पड़ोसी कुछ देखते हैं। समाज भी कुछ देखता है। लेकिन हर किसी को लगता है कि शायद कोई दूसरा आगे बढ़ेगा। इसी इंतजार में एक छोटा गड्ढा खाई बन जाता है।

एक समय इन सवालों का मेरे पास भी कोई उत्तर नहीं था। मैं उत्तर प्रदेश के बागपत के एक छोटे से गांव से आता हूं। कभी अखबार बेचे, ट्यूबलाइट फैक्ट्री में भी काम किया। उन्हीं दिनों मेरी उम्र के कई बच्चे दुकानों, ढाबों और फैक्ट्रियों में काम करते दिखाई देते थे। मैं अखबार बेचकर अपना रास्ता खोज रहा था, लेकिन मन में एक सवाल बार-बार उठता था—अगर मुझे रास्ता मिल गया, तो उन बच्चों और युवाओं का क्या होगा जिन्हें रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है?

यही सवाल मुझे युवाओं के बीच ले गया। जहां भी युवाओं से जुड़ा कोई अभियान मिला, मैं जुड़ता गया। जहां भी कोई योजना मिली, उसे गांव तक पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन हर साल एक बात परेशान करती रही। जिन युवाओं को आगे लाने की कोशिश की, उनके साथ-साथ हर साल नए युवा पीछे भी छूटते गए। तब पहली बार लगा कि शायद हम किसी बड़ी बात को समझ नहीं पा रहे।

इसी बेचैनी के साथ मुझे लगातार दूसरे वर्ष सत्यार्थी समर स्कूल में जाने का अवसर मिला। वहां मैंने ऐसे युवाओं से मुलाकात की जिन्हें कभी बाल मजदूरी से मुक्त कराया गया था लेकिन आज वे स्वयं शिक्षा और सामाजिक बदलाव का हिस्सा हैं। बंजारा समुदाय के ऐसे युवा साथी भी मिले जो अपने परिवार में स्कूल जाने वाले पहले व्यक्ति बने और बाद में अपनी पूरी बस्ती को शिक्षा से जोड़ने लगे।

वहीं पहली बार मेरे भीतर एक वाक्य साफ हुआ— हम वर्षों से लोगों को गड्ढों से निकाल रहे हैं, लेकिन गड्ढे नहीं भर रहे।

हम किसी युवा को नशे से बाहर निकालते हैं, लेकिन उस निराशा तक कम पहुंचते हैं जहां से नशा शुरू हुआ। हम किसी बच्चे को स्कूल वापस लाते हैं, लेकिन उस वजह को नहीं बदलते जिसने उसे स्कूल छोड़ने पर मजबूर किया। हम किसी बेरोजगार युवा को एक अवसर दिला देते हैं, लेकिन उस गांव तक अवसरों की जानकारी पहुंचाने वाली व्यवस्था नहीं बनाते जहां सैकड़ों दूसरे युवा अब भी इंतजार कर रहे हैं।

यहीं मेरी सोच बदली। पहले मुझे लगता था कि सफलता का मतलब अधिक से अधिक युवाओं तक पहुंचना है। आज लगता है कि सफलता किसी एक जीवन को बदल देने में नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां बदलने में है जिनसे कम लोग पीछे छूटें और जो आगे बढ़ें, वे दूसरों का रास्ता भी रोशन करें।

जब कोई बच्चा अपराधी बनता है, जब कोई युवा नशे में चला जाता है, जब कोई विद्यार्थी मानसिक तनाव से हार जाता है—तो क्या केवल वही असफल हुआ? या फिर हम सब कहीं न कहीं असफल हुए? क्योंकि जिस गड्ढे में वह गिरा, वह एक दिन में नहीं बना था। उसे बनाने में हमारी चुप्पियां, हमारी अनदेखियां, हमारी प्राथमिकताएं और कई बार हमारी सुविधाएं भी शामिल थीं।

सत्यार्थी समर स्कूल से लौटते समय मेरे पास एक नया सवाल था। अगर हर साल हम हजारों युवाओं की मदद कर रहे हैं, तो हर साल हजारों नए युवा पीछे क्यों छूट रहे हैं? शायद इसलिए कि हम हर बार आख़िरी घटना से लड़ते हैं, पहली वजह से नहीं।

यहीं आकर मुझे करुणा का अर्थ समझ आया। करुणा किसी के लिए दुख महसूस करना भर नहीं है। करुणा किसी की एक बार मदद कर देना भी नहीं है। करुणा वह नैतिक बेचैनी है, जो किसी व्यक्ति की मदद करने के बाद भी चैन से नहीं बैठती। वह पूछती है—जिस कारण से यह पीड़ा पैदा हुई, क्या वह अब भी मौजूद है? अगर उत्तर हां है, तो काम अभी पूरा नहीं हुआ।

आज भी हमारे गांवों, कस्बों और शहरों में ऐसे अनगिनत गड्ढे हैं—जानकारी की कमी के, बेरोजगारी के, मानसिक तनाव के, नशे के, अवसरों तक असमान पहुंच के और उस टूटे हुए विश्वास के कि मेरे लिए भी कोई रास्ता है। इन गड्ढों को केवल सरकार नहीं भर सकती। केवल स्कूल नहीं भर सकते। केवल परिवार नहीं भर सकते। केवल स्वयंसेवी संस्थाएं भी नहीं भर सकतीं। क्योंकि ये गड्ढे किसी एक घटना, व्यक्ति, संस्था ने नहीं बनाए। ये हमारी सामूहिक अनदेखी से बने हैं। इसलिए इन्हें भरने की जिम्मेदारी भी साझा है।

शायद अब हमें सफलता का अर्थ बदलना होगा। यह नहीं कि हमने कितने लोगों की मदद की। यह कि हमने ऐसी परिस्थितियां कितनी कम कीं, जिनमें लोगों को मदद की जरूरत ही न पड़े। यह नहीं कि कितने युवाओं को आगे बढ़ाया। यह कि कितने युवाओं को पीछे छूटने से रोका। यह नहीं कि कितने बच्चों को स्कूल वापस लाया। यह कि कितने बच्चों को स्कूल छोड़ना ही नहीं पड़ा।

आज भी जब किसी युवा की असफलता की खबर सुनता हूं, तो सबसे पहले यही सवाल मन में आता है कि वह कहां गिरा था? और उससे भी बड़ा सवाल कि वह गड्ढा अब तक भरा क्यों नहीं गया? हो सकता है यही सवाल किसी दिन हमारे गांवों को बदले। हमारे स्कूलों को बदले। हमारी योजनाओं को बदले। हमारी प्राथमिकताओं को बदले। और शायद हमें भी। क्योंकि सड़क के गड्ढे वाहन गिराते हैं। लेकिन समाज के गहरे गड्ढे पूरी पीढ़ियां गिरा देते हैं।

लेखक- अमन कुमार
लेखक- अमन कुमार (राज्य युवा पुरस्कार विजेता; माय भारत स्वयंसेवक)
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